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उत्तराखंड, कुमाऊं तथा गढ़वाल नामों की उत्पत्ति का इतिहास - विस्तृत वर्णन | उत्तराखंड का इतिहास

History of the origin of the names of Uttarakhand, Garhwal, and Kumaun - History of Uttarakhand

"उत्तराखण्ड" - नामोत्पत्ति
हरिद्वार से मानसरोवर तक का भूभाग केदारखण्ड और मानसखण्ड उपपुराणों के अनुसार 'केदारखण्ड' और 'मानसखण्ड' दो भागों में बँटा था, जिनकी सीमा पश्चिम में टोन्स (तमसा नदी) से पूर्व में काली (शारदा) नदी तक मानी गई है। संयुक्त रूप से दोनों को उत्तराखण्ड कहा जाता है। कालांतर में केदारखण्डं और मानसखण्ड के उत्तरवर्ती दो बड़े राज्यों, गढ़वाल और कुमाऊँ का उदय हुआ जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और गोरखा नरेशों के शासनकाल तक अस्तित्वमान थे, लेकिन उत्तराखण्ड नाम निश्चित रूप से गढ़वाल और कुमाऊँ से पूर्ववर्ती है, परन्तु केदारखण्ड और मानसखण्ड से उत्तरवर्ती है। केदारखण्ड और मानसखण्ड के नाम यद्यपि महाभारतकाल तक प्रचलित थे, तथापि इस काल में केदारखण्ड और मानसखण्ड का आधिपत्य एक ही नरेश विराट के अधीन आ गया। ज्ञातव्य है कि वैष्णवों के समय में भी यह संपूर्ण क्षेत्र एक ही प्रशासनिक व्यवस्था से संचालित रहा, जिस कारण इसको नारायणी क्षेत्र या देवभूमि के नाम से पुकारा जाता रहा। मत्स्यराज, महाराजा विराट के शासन के पश्चात केदारखण्ड व मानसखण्ड को संयुक्त रूप से एक ही नाम उत्तराखण्ड से जाना जाने लगा।
History of origin of Names Uttarakhand, Garhwal, and Kumaun, उत्तराखंड, कुमाऊं तथा गढ़वाल

Famous Painting 'View of the Ganga at Haridwar' from the book written by James Tillyer Blunt (1765-1834) about the view of the hills of Garhwal from the historical pilgrimage city Haridwar and the holy river Ganga in the year 1790. (Source: British Library).

उत्तराखण्ड शब्द मर्यादा व सम्मान का प्रतीक है, जहाँ विराट ने शरणागतों (अज्ञातवास काल में पाण्डवों) को शरण दी, जहाँ शरणागतों ने मर्यादा का कठोर पालन किया, जहाँ धर्म हमेशा अधर्म पर हावी रहा, जहाँ अतिथि देवता समझा गया, जह सत्पुरुषों के लिए सर्वस्व समर्पित किया गया, जहाँ महाबलि ने नारी को श्रद्धा और सम्मान के शिखर पर पहुँचा दिया, जिस क्षेत्र को महान चक्रवर्ती सम्राटों द्वारा शासित नहीं किया गया, बल्कि स्वायत्त रखा गया, उस उदार, धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान का नाम है उत्तराखण्ड। हिमालयी क्षेत्रों के गजेटियर सर्वप्रथम 1882 ई. में ई.टी. एटकिन्सन द्वारा संपादित होकर प्रकाशित हुए। 'उत्तराखण्ड' का इतिहास अति प्राचीन होने पर भी, किसी भी गजेटियर में 'उत्तराखण्ड' शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है। स्पष्ट है कि 'उत्तराखण्ड' शब्द का प्रचलन 20वीं शती के प्रथम दशक में हुआ। केदारखण्ड पुराण के 1911 ई. में प्रकाशित द्वितीय संस्करण में 'उत्तराखण्ड' शब्द का उल्लेख निम्नवत् मिलता है।

'भूस्वर्ग उत्तराखण्ड हिमाच्छादित भू भाग का तत्त्वपूर्ण विस्तृत खण्ड'

1923 में शालिग्राम वैष्णव द्वारा रचित 'उत्तराखण्ड रहस्य', 1946 में गोविन्द प्रसाद नौटियाल की 'बसुधारा' पुस्तक में उत्तराखण्डीय तीर्थ', 1952 में बालकष्ण रचित 'कनकवंश काव्य' की भूमिका में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा प्रयुक्त शब्द 'उत्तराखण तथा 1953 में हरिराम धस्माना कृत 'ऋग्वैदिक माता' में 'उत्तराखण्ड हिमालय उल्लेख होने पर 'उत्तराखण्ड' शब्द प्रचलन में आ गया। सन् 1960 में डा. शिवाय डबराल ने 'उत्तराखण्ड यात्रा दर्शन' तथा कई खडा म उत्तराखण्ड का इतिहास लिखकर इस शब्द को लोकप्रिय बना दिया।
महाकवि कालिदास द्वारा 'कुमार सम्भव' महाकाव्य (1/1) में 'अस्तुतरस्याँ' शब्द का प्रयोग करके उत्तर दिशा की ओर संकेत करने के साथ-साथ कई प्राचीन ग्रंथों एवं शब्दकोशों में 'उत्तरंग', 'उत्तरत्र', 'उत्तराहि', 'उत्तरीयम', 'उत्तरेण', 'उत्तरकुरु', 'उत्तरमद' 'उत्तरपथ' या 'उत्तरापथ' जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है, जिनका संबंध निश्चित ही 'उत्तराखण्ड' से है। किंतु 'उत्तराखण्ड' नाम सर्वथा नवीन है, इसकी पुष्टि डॉ. डबराल ने भी की है। उनके अनुसार उत्तर दिशा में स्थित मध्य हिमालय के इस क्षेत्र के नाम में 'उत्तरापथ' के पूर्व पद को मानसखण्ड तथा केदारखण्ड पुराणों के अंतिम उपपद, 'खण्ड से जोड़कर शब्द-संयोजन द्वारा 'उत्तराखण्ड' नाम दिया गया है।
राज्य गठन की चरम स्थिति में प्रस्तावित 'उत्तराखण्ड राज्य (गढ़वाल तथा कुमाऊँ के विशद्ध पर्वतीय अंचल) में हरिद्वार जनपद को सम्मिलित करके राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित होने पर, 'उत्तरांचल' नाम रख दिया गया था, जो 1 जनवरी 2007 को 'उत्तराखण्ड में परिवर्तित हो गया है।

गढ़वाल की नामोत्पत्ति कैसे हुई

गढ़वाल अर्थात् गढ़+वाल-गढ़ों वाला क्षेत्र। अर्थात् वह क्षेत्र जिसमें कई गढ हों। गढ़ शब्द का अर्थ है पर्वतीय क्षेत्रों में अथवा पहाड़ियों पर किले। उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में 'गढ़' शब्द पहाड़ी किलों का बोधक है, जो सुरक्षा की दृष्टि से पहाड़ियों की चोटियों पर बनाये जाते थे। पं. हरिकृष्ण रतूड़ी के अनुसार ऐसा पर्वतीय क्षेत्र जिसमें कई गढ़ हों, उसे गढदेश, गढ़वार या गढ़वाला कहा गया। शनै:-शनै: गढ़वाला शब्द गढ़वाल कहलाने लगा। ये किले पूर्वकाल के छोटे-छोटे ठकुरी राजाओं, सरदारों और थोकदारों के थे तथा उन राजाओं और सरदारों के राज्य विभागों के नाम भी पृथक-पृथक थे, जो अब परगनों और पटियों के नाम से विख्यात हैं।  संतान ले बालनाथ जोगी को संतान पते पतीसाहीदेव न्यूले' उल्लेख मिलता है। केदारखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र दक्षिण में गंगाद्वार (हरिद्वार) से उत्तर में श्वेतांग पर्वत (हिमालय) श्रेणियों के अंत तक तथा पूर्व में बौद्धांचल (संभवत: बधाण पट्टी) से पश्चिम में तमसा (टोन्स) तक माना जाता है। पौराणिक ग्रंथ केदारखण्ड के इस श्लोक से यह स्पष्ट है।

गंगाद्वार मर्यादं श्वेतांत वर वर्णिनि। तमसा तटतः पूर्व माऽर्य बौद्धाचलं शुभम्।।28।।

केदारखण्ड या हिमवंत प्रदेश का नाम गढ़वाल पड़ने के सम्बन्ध में साहित्यकार डॉ. हरिदत्त भट्ट 'शैलेश' का मत है कि इस भूभाग में असंख्य छोटी-बड़ी जलधारायें हैं जो क्रमश: 'गड' तथा 'गाड' कहलाती हैं। ये दोनों शब्द वैदिक संस्कृत के हैं। इतनी जलधारायें, कश्मीर, कुमाऊँ, हिमाचल प्रदेश तथा नेपाल किसी भी पर्वतीय प्रदेश में नहीं हैं। अतः 'गडवाल' अर्थात् छोटी-छोटी नदियों वाला प्रदेश ही कालांतर में गढ़वाल नाम से विख्यात हो गया। यों भी गढ़वाल में दोनों प्रमुख नयार नदियों को प्रारंभिक अवस्था में ढाईज्यूली गाड (प. नयार) तथा स्यूंसी या कैन्यूर गाड (पू. नयार) कहा गया है। इन दोनों तथा गढ़वाल की सभी बड़ी नदियों (गाड) की सहायक छोटी-बड़ी नदियों (गड या गाड) के कुछ नाम इस प्रकार हैं, जैसे- अट्टागाड, रथगड, ढौंडीगाड, धुरपालीगाड, लच्छीगाड, रिखागाड, पचौरागाड, मछलदगाड, मुसेटीगाड, भैंसगड, मैदीगाड (उत्तरोमुखी मधुगंगा), सैन्तोलीगाड, चौमासगाड, पैडुलगाड, कोलागड, खरगड, सेलगड, केलगड, पिनगड, विडोलगड, सिगड, गैडगड, कटूलीगाड, गडूलीगाड, अमोठागाड, किमोलीगाड, कौडागाड, धनगड एवं भेलगड आदि। ___ गढ़वाल क्षेत्र में जातियों के नाम के आगे अकारांत शब्दों में 'वाल' जैसे सेमवाल. डंगवाल तथा इकारांत शब्दों में 'याल', जैसे थपलियाल, नौटियाल लगता है। 'वाल' या 'वार' शब्द की उत्पत्ति 'वारि' (जल) से भी संभव है। संस्कृत में रलयोरमेढ अर्थात 'र' और 'ल' में कोई अंतर नहीं माना गया है। अत: यह भी सम्भव है कि 'गढवाल' शब्द की उत्पत्ति 'गढ़वार' से हुई हो। पातीराम ने अपनी पुस्तक (Garhwal Ancient and Modern) में उल्लेख किया है कि गढ़पाल से गढ़वाल नाम पड़ा है, क्योंकि गढ़वाल में संकल्प पूजा-पाठ में 'गढ़पाल' शब्द का बार-बार प्रयोग हुआ है।

कुमाऊँ की नामोत्पत्ति कैसे हुई

उत्तराखण्ड के पूर्वी भाग कुमाऊँ को कु[ अथवा कूर्मांचल भी कहा जाता है, जिसे स्कन्दपुराण के अनुसार मानसखण्ड कहा गया है। कु[ प्राचीन नाम है। इस नाम की उत्पत्ति कूर्म (कछुवा) शब्द से हुई है, मानसखण्ड पुराण के अनुसार कूर्मावतार स्थल ही कूर्मशिला है जो जनपद चम्पावत में स्थित है।
दक्षिणे पर्ण पत्रायाः पुण्य कूर्माचलो गिरिः कूर्म पाढाकित शुद्धोः यक्ष गन्धर्व सोवित।।

मानसखण्ड 67/2/3 कुछ विद्वानों के अनुसार पश्चिमी एशिया से इस भूभाग में प्रवास करने वाली खश जाति ने अपने प्राचीन निवासक्षेत्र 'कुम्म' के आधार पर इस क्षेत्र का नाम कुम्मु रख दिया, जो कालांतर में 'कुमुं' में परिवर्तित हो गया। कुमाऊँ को कूर्मांचल, कूर्मप्रस्थ या कूर्मपृष्ठ भी कहा गया है। कूर्माचल का शाब्दिक अर्थ है कूर्म की भाँति आँचल वाला। निस्संदेह कुमाऊँ प्रभाग की पर्वत श्रेणियों की सामान्य रचना कूर्मपृष्ठ (कछुवे की उन्नतोदर पीठ) की भाँति साधारण ढालों वाली है। महाहिमालय के इस भाग में पंचाचूली (6904 मी.) के अतिरिक्त कोई भी उल्लेखनीय पर्वत शिखर नहीं है। इसके अतिरिक्त मध्यकाल में कानदेव पर्वत के निकट कूर्मशिला में कूर्मावतार होने का प्रसंग भी मिलता है। जैसा पहले उल्लेख किया गया है कि मानसखण्ड पुराण में कूर्माचल शब्द का प्रयोग मिलता है, जिसके अन्तर्गत अग्नि पुराण के कूर्मावतार प्रकरण और देव-दानव युद्धस्थल का भी विवरण मिला है। वस्तुत: मानसखण्ड के अनुसार विष्णु का कूर्मावतार, चम्पावत जनपद में कूर्मपर्वत (कांडाकानदेव) पर हुआ था, जिससे कूर्माचल (कूर्माचल) नाम प्रचलन में आ गया। शक्ति संगम तंत्र (8/12/13) के अनुसार भी कुमाऊँ को कूर्मप्रस्थ कहा गया है।
कुमाऊँ से कैलाश मानसरोवर जाने का सुगमतम मार्ग बताया जाता है। अत: इस क्षेत्र का दूसरा नाम मानसखण्ड है। इस परिकल्पना की पुष्टि मानसखण्ड पुराण के इस पद से होती है- 'धन्वन्तरि को दत्तात्रैय ने काशी से कैलाश-मानसरोवर जाने और वहाँ से लौटने का मार्ग बतलाया है।
इस प्रकार संपूर्ण कुमाऊँ मंडल को कूर्मपृष्ठ, कूर्माचल, कूर्मप्रस्थ, मानसखण्ड, कुमायूँ तथा कुमाऊँ नामों से संबोधित किया गया है। ये सभी नाम समानार्थी तथा एक ही क्षेत्र के बोधक हैं।